मंजिल तो इंतज़ार करती है राही का , बस राही हौसला तो दिखाए |


मंजिल तो इंतज़ार करती है राही का , बस राही हौसला तो दिखाए |
दो-दो कदम जो चले यहाँ पे हर मंजिल को वो पाए ||

थक कर चूर ना होने देना अपने अंतर्मन को |
यही घडी वो होती है जो बहकाए राही के मन को ||

बेशक मुश्किल होती है जीवन में कुछ भी पाने में |
प्रयास अगर हो सच्चे मन से , कुछ भी नामुमकिन नहीं इस ज़माने में ||

हमको तो अब बस मंजिल देखती और नहीं कुछ देखता |
कैसे कहे ये व्याध मन की , अब तो कविता में सच्चाई हूँ लिखता ||
(BY SPT)

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